मूवी रिव्यू: एक था ‘वीरप्पन’

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दो दशक से भी ज्यादा वक्त तक तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल के जंगलों को अपना आशियाना बनाकर और वहीं से अपनी खूंखार करतूतों को अंजाम देनेवाला कूसे मुनीस्वामी वीरप्पन जब हिंदी सिनेमा के पर्दे पर आया, तो उसने दरिंदगी का वो एहसास नहीं कराया, जिसके लिए वो कभी जाना जाता था, उसने उस तरह खौफजदा नहीं किया, जिसके लिए देशभर में कभी वो चर्चित हुआ था.
तीन राज्यों के संयुक्त प्रयासों वाले ‘ऑपरेशन कुकून’ में 12 साल पहले मारे गए वीरप्पन को काबिल डायरेक्टर रामगोपाल वर्मा पर्दे पर फिर से जीवंत करने में नाकाम साबित होते है. यूं तो वर्मा ने ही ‘वीरप्पन’ को मूल रूप से पहले ‘किलिंग वीरप्पन’ नाम से कन्नड़ भाषा में बनाया था, जिसे सराहे जाने की काफी खबरें आईं थीं. फिर तमिल और तेलुगू में भी इसका डब्ड वर्जन रिलीज किया गया था. मगर चंदन की लकड़ी और हाथी दांत की तस्करी करते-करते सैंकड़ों हाथियों, आम लोगों और पुलिसवालों को मारने वाले ‘वीरप्पन’ का हिंदी अवतार प्रभावहीन-सा है.
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी ना सिर्फ फिल्म की सपाट और प्रेडिक्टेबल कहानी है, बल्कि प्रॉबल्म ये भी है कि पूरी फिल्म ‘वीरप्पन’ की जिंदगी औऱ दरिंदगी पर नहीं, उसे पकड़ने और उसे मारने के प्लॉट के इर्द-गिर्द घूमती है, वो भी एक साधारण चोर-पुलिस स्टाइल में.
टाइटल रोल के बावजूद वीरप्पन मुख्य पात्र की बजाय उप-पात्र के तौर पर सामने आता है. वो बीच-बीच में अपनी बनावटी क्रूरता की छोटी-छोटी झलकियां दिखाते हुए बैकग्राउंड में चला जाता है. फिर चाहे वो हाथियों पर गोलियां चलाकर उन्हें ढेर करने के सीन्स हों या फिर अति-क्रोधित अंदाज में इंसानों पर हमला कर उनका खात्मा करने के दृश्य हों. हालांकि संदीप भारद्वाज हू-ब-हू ‘वीरप्पन’ की तरह दिखने के स्तर पर काफी प्रभावित करते हैं और गुस्सैल अंदाज में कभी-कभार अपनी काबिलियत का नमूना भी पेश करते हैं.
गौरतलब है कि वीरप्पन को पकड़ने की कोशिशों में सबसे आगे रहे अफसर का रोल निभानेवाले सचिन जोशी फिल्म में खुद वीरप्पन से ज्यादा स्क्रीन स्पेस पाते हैं. फिल्म का दी एंड भी उन्हीं के एक डायलॉग – ‘एक राक्षस को मारने के लिए उससे भी बड़ा राक्षस बनना पड़ता है’ से होता है. ‘वीरप्पन’ की शुरुआत भी सचिन के वॉइसओवर से होती है, जो एक सपाट ढंग से उसकी जिंदगी को बयान करती है. पूरी फिल्म भी इसी तर्ज पर आगे बढ़ती और खत्म हो जाती है, शिद्दत से इस बात का एहसास कराए बगैर कि वीरप्पन किस कदर क्रूर और कुख्यात था.
बता दें कि सचिन फिल्म के प्रोड्यूसर भी हैं. फिल्म वीरप्पन की क्रूरता पर कम और उसे पकड़ने की जद्दोजहद करनेवाले इसी अफसर पर ज्यादा फोकस करती है. और तो और, सचिन बुरी तरह से वीरप्पन के पीछे पड़ जाने वाले और पिछली तमाम नाकाम कोशिशों के बाद आखिरकार उसे मौत के अंजाम तक पहुंचाने वाले एसटीएफ अफसर के किरदार के साथ कतई इंसाफ नहीं करते हैं.
वैसे फिल्म में सपाट और प्रभावहीन अंदाज में एक्टिंग करने का श्रेय सिर्फ सचिन को नहीं जाता. वीरप्पन के हमले में मारे जाने वाले एक एसटीएफ अफसर की पत्नी श्रेया का किरदार निभानेवाली लीजा रे ओवरएक्टिंग करने के मामले में सबको पीछे छोड़ देती हैं. लीजा के चेहरे पर आनेवाले भावों का अतिरेक देखकर कहीं-कहीं हंसने का मन भी करता है.
रामगोपाल वर्मा वीरप्पन की पत्नी मुथुलक्ष्मी के तौर पर नैशनल अवॉर्ड विनर मराठी अभिनेत्री ऊषा जाधव से भी नपे-तुले अंदाज में एक्टिंग नहीं करवा पाए हैं. फिल्म की तरह की उनका किरदार भी एक आयामी नजर आता है. पूरी फिल्म में अगर किसी एक किरदार पर जाकर नजर ठहरती है, तो वो है कुमार का किरदार निभानेवाले कृष्णन श्रीनाथ पर, जो वीरप्पन को श्रीलंका में एलटीटीई प्रमुख प्रभाकरण से मिलवाने का झांसा देकर उसे पहले ही बुने गए जाल मे फांसता है, जो अंतत: वीरप्पन और खुद उसकी भी मौत की वजह साबित होती है.
ऐसा नहीं है कि ‘रात’, ‘रंगीला’, और ‘सत्या’ जैसी चर्चित फिल्में बनाने वाले रामगोपाल वर्मा का जंगलों और पहाड़ों से पहली बार वास्ता पड़ा हो. मगर ‘वीरप्पन’ में जंगलों का इस्तेमाल एक अहम किरदार की तरह ही नहीं. बल्कि किसी प्रॉप की तरह होता है. जंगलों में फिल्माए गए ‘वीरप्पन’ के एकाध सीन्स को छोड़कर जंगलों का घनापन फिल्म से नदारद नजर आता है.
तकनीकी दक्षता और कैमरे की कारीगिरी के लिए जाने जानी वाली रामगोपाल वर्मा की फिल्मों के उलट ‘वीरप्पन’ एक भी ऐसा शॉट नहीं पेश नहीं करता, जो आपके जेहन पर चस्पां हो जाए, एक भी ऐसा डायलॉग नहीं बोलता है, जो आपको याद रह जाए. हां, फिल्म के पार्श्व में निरंतर बजने वाला संगीत और वीरप्पन की वीरता और क्रूरता को रेखांकित करनेवाले कुछ बेतुके गानों का शोर मन में कुंठा जरूर पैदा करता है और फिल्म को और बोझिल बनाने में मदद करता है.
तकरीबन 25 साल पहले बॉलीवुड में कदम रखनेवाले ‘आउडसाइडर’ रामगोपाल वर्मा की वापसी की उम्मीद ‘वीरप्पन’ के धरातल पर कतई खरी नहीं उतरती. वीरप्पन फिल्मी अंदाज में मर तो जाता है, मगर ये फिल्म हिंदी सिनेमा के पर्दे पर रामगोपाल वर्मा के पुनर्जीवित होने की तरफ कहीं कोई इशारा नहीं करती है.
रामगोपाल वर्मा को हिंदी में ‘वीरप्पन’ बनाने से पहले शायद एक बार शेखर कपूर की ‘बैंडिंट क्वीन’ या फिर 18 साल पहले बनाई अपनी ही फिल्म ‘सत्या’ एक बार फिर से देख लेनी चाहिए थी.