असम के CM बने सर्बानंद, नॉर्थ-ईस्ट में ताकत दिखाने पहुंचे BJP नेता

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गुवाहाटी. असम के नए सीएम के तौर पर सर्बानंद सोनोवाल शपथ ली। असम में पहली बार बीजेपी की सरकार बनी है। शपथ ग्रहण समारोह में नरेंद्र मोदी, अमित शाह, लालकृष्ण आडवाणी समेत बीजेपी के बड़े नेता पहुंचे हैं। प्रोग्राम में 100 से ज्यादा वीवीआईपी पहुंचे हैं। मोदी एक रैली भी करने वाले हैं। नॉर्थ ईस्ट में पहली बार अपनी ताकत दिखा रही है बीजेपी…
– नॉर्थ ईस्ट में असम में पहली बार सरकार बनाने के साथ ही बीजेपी अपनी ताकत भी दिखा रही है।
– शपथ समारोह में पीएम के अलावा कई केंद्रीय मंत्री पहुंचे हैं।
– गुजरात की सीएम आनंदीबेन, राजस्थान की वसुंधरा राजे भी पहुंची हैं।
– इसके अलावा आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर समेत कई वीवीआईपी शामिल हो रहे हैं।
– प्रोग्राम में असम के पूर्व सीएम तरुण गोगोई भी नजर आए।
ये बने मंत्री
अतुल बोरा, प्रमिला रानी, हेमंत विश्वा, परमिल शुक्ल वैद्य, चंद्रमहोन पटवारी, केशव महंता, रंजीत दत्ता।
– सोनोवाल के साथ 10 मिनिस्टर भी शपथ ले रहे हैं।
– इनमें से 5 बीजेपी और 2-2 मंत्री अलायंस असम गण परिषद (AGM) और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (BPF) के हैं।
– सूत्रों की मानें तो एजीएम ने 5 और बीपीएफ ने 4 विधायकों को मंत्री बनाने की मांग की थी।
– बता दें कि असेंबली इलेक्शन में बीजेपी ने 60 सीटें जीती हैं।
– वहीं एजीएम को 14 और बीपीएफ को 12 सीटों पर जीत हासिल हुई है।
ये हैं असम में बीजेपी को पहली बार सत्ता में लाने वाला चेहरा
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– असम के बीजेपी नेता सर्बानंद सोनोवाल खुद को ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं करते यानी लो प्रोफाइल नेता हैं, लेकिन चेहरे पर ऐसी मुस्कान रहती है, जो लोगों का मन मोह लेती है।
– वे 1970 के दशक में जेगन हजारिका के बाद असम के दूसरे आदिवासी सीएम बनने की दहलीज पर पहुंच चुके हैं।
– उनके कारण असम में बीजेपी पहली बार अपने बूते सरकार बनाने जा रही है।
– मोदी कैबिनेट में यूथ और स्पोर्ट्स अफेयर्स के राज्य मंत्री रहे 53 साल के सोनोवाल ऑल असम स्टूडेंट यूनियन के नेता रहे हैं और कचारी आदिवासी समूह को रिप्रेजेंट करते हैं।
– आदिवासी होने के कारण वे आरएसएस और बीजेपी दोनों की पसंद थे।
– बीजेपी में आने के बाद उन्होंने आदिवासी लीडरशिप और पार्टी की हिंदुत्ववादी पॉलिसी को अच्छे तरीके से पेश किया।
– अवैध घुसपैठियों पर लगाम लगाकर असम में सुशासन लाना उनका राजनीति में आने का लक्ष्य रहा है।
– वे 1996 से 2000 तक नार्थ ईस्ट स्टूडेंट आर्गनाइजेशन में रहे।
– फिर 2001 में असम गण परिषद में। अब उन्हें लगा कि इस मुद्‌दे पर उनका रुख बीजेपी से मिलता है। इस तरह उन्होंने ‘उत्तर भारतीय पार्टी’ को पूर्वोत्तर के राज्य में आदिवासियों के बीच नाम दिलाया।
सोनोवाल का करिश्मा
– यह सोनोवाल का ही करिश्मा था कि उन्होंने असम में तब जीत लाकर दिखाई जब मोदी की 2014 के चुनाव वाली लहर ठंडी पड़ रही थी।
– 2014 के लोकसभा चुनाव में भी 14 में से 7 सीटों पर पार्टी को जीत दिलाने में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई थी।
– उन्होंने 25 से 30 सीटों पर प्रभाव डालने वाले बोडो पीपल्स फ्रंट के साथ पार्टी के गठबंधन में भी भूमिका निभाई।
– आदिवासियों में पैठ होने के अलावा सोनोवाल की इमेज स्वच्छ नेता की रही, उनका पुराना कोई इतिहास नहीं रहा और मोदी का भरोसा भी उन्हें हासिल रहा।tarun cm
लो-प्रोफाइल रहकर किया काम
– चूंकि सोनोवाल लो प्रोफाइल लीडर रहे हैं तो उन्होंने विरोधियों और खासतौर पर तरुण गोगोई पर व्यक्तिगत हमलों से परहेज रखा।
– उन्होंने आरएसएस शैली के प्रचार पर जोर दिया यानी ज्यादा से ज्यादा व्यक्तिगत संपर्क।
– आदिवासी समूहों में भी अवैध घुसपैठ से आबादी के चरित्र में बदलाव की आशंका मौजूद है। इसलिए कांग्रेस या गोगोई पर ज्यादा प्रहार करने की बजाय उन्होंने बांग्लादेश से लगी सीमा सील करने पर ही ज्यादा जोर दिया। – इसके बाद उन्होंने असम के मूल नागरिकों का रजिस्टर बनाने पर जोर दिया ताकि मूल निवासियों की आशंकाओं को दूर किया जा सके।
– उन्होंने कहा कि हिंदू हो या मुस्लिम या किसी अन्य धर्म का, हर मूल नागरिक को प्रोटेक्शन दिया जाएगा। इससे उनकी स्वीकार्यता बढ़ी।