अपने गाँव की लहलहाती खेती की कुछ तस्वीरें

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पंद्रह सालों के बाद गांव में अपने खेतों को देखने गया था। वहां हरियाली की छटा बेहद निराली थी और लहलाते फसल का दृश्य दिल छू लेने वाला था। गाँव भी बहुत प्यारा लग रहा था। अपने गाँव में बहुत कुछ बदल गया है समय के साथ साथ। लेकिन गाँव का अपनापन नहीं बदला। इस बार भी गाँव में जब गेहूं, चना, मटर, तोरी, धनिया, बरसीन, आलू , ऊख आदि की लहलहाती फसलों को देखकर बचपन की कई यादें ताजा हो गयी। यही वजह है कि जब गाँव के पगडण्डी पर खड़ा हो कर सोचता हूं, तो लगता है जो मज़ा खेती किसानी में है वो देश के किसी भी व्यवसाय में नहीं है। फसल ज्यादा हो या काम, उसी में किसान बहुत खुश रहते हैं और बिना टेंशन के एक अच्छी लाइफ भी जीते हैं। अगर फसल बर्बाद होती है, तो फिर वे नए सिरे से किसानी में लग जाते हैं। उन्हें देख कर लगता है कि हमें भी स्ट्रगल में घबराना नहीं चाहिए और धैर्य के साथ मजबूती से आगे बढ़ता रहना चाहिए। वैसे लिखना तो बहुत कुछ चाहता हूं, लेकिन फिलहाल मुंबई आ चुका हूं। बहुत सारे काम पेंडिंग में हैं। उन्हें भी पूरा करना जरूरी है। फुर्सत के पलों में कभी फिर अपने गांव की सौंधी खुशबू से रूबरू करवाऊंगा।